कबीरा खड़ा बाजार में, लिये लुकाठी हाथ
जो घर फूंके आपना, चले हमारे साथ।
आखिर अपना घर जलाने की शर्त कबीर ने क्यों लगाई होगी? दुनिया के बाजार में वह खड़े हैं, और कई लोग उनके साथ जाने को तैयार भी हैं। ऐसे में यह नई, अनोखी और कठिन शर्त लगाकर अपनी मुश्किल क्यों बढ़ाना? कहते हैं, वह इसलिए कि जिस राह पर कबीर को चलना था, वहां घर जलाए बगैर कोई बढ़ ही नहीं सकता।
खैर, कबीर की कबीर पर छोड़ें। उन्हें जिस राह पर भी जाना रहा हो, उसकी जरूरतें वे जानें और उनके साथ जाने का फैसला करने वाले उनके चेले-चपाटी। हम तो आज की दुनिया में रहते हैं और अपने घर-परिवार की कदर करते हैं। दुनिया को बेहतर बनाने की इच्छा भी अगर हमारे मन में जगती है तो उसकी बड़ी वजह अमूमन यह चिंता ही होती है कि जैसी यह दुनिया है और जैसी यह होती जा रही है, उसमें न तो हमारा घर-परिवार सुरक्षित रह सकता है और न हमारे अपनों को सुकून भरी जिंदगी मयस्सर हो सकती है।
दिक्कत यह है कि कबीर और उनकी दुनिया भले सदियों पीछे छूट चुके हों, उनके सवाल आज भी हमारा पीछा कर रहे हैं। दो-चार कदम चलते ही हमें अहसास होने लगता है कि चाहे किसी भी मकसद से और कितनी भी छोटी या मामूली सी लड़ाई शुरू करें अगर वह लड़ाई येन-येन-प्रकारेण कुछ हथिया भर लेने की न हुई, अगर उसका थोड़ा भी नाता न्याय-अन्याय से या सही-गलत से हुआ तो फिर घर-बार का कुछ न कुछ हिस्सा कुर्बान किए बिना उस पर आगे बढ़ ही नहीं सकते।
करियर न सही, करियर की चिंता तो छोड़नी ही पड़ती है। अगर पूरी तरह छोड़ न भी दें, उसे स्थगित तो करना ही पड़ता है। 2011-12 में अन्ना की आंधी में गांधी बने केजरीवाल साहब ने भी तब के आंदोलनकारी युवाओं से कहा ही था कि ‘देश के लिए एक सप्ताह का समय दे दो। करियर तो फिर बन जाएगा।‘ वे युवा अगर परीक्षा और करियर की चिंता को स्थगित न करते तो केजरीवाल की देश-निर्माण परियोजना उसी समय कार्यकर्ताओं की कमी के चलते दम तोड़ देती।
हालांकि स्थगन से यात्रा शुरू भर होती है। यात्रा जारी रखनी है, कदम आगे बढ़ाते रहना है तो अपने अंदर की इच्छाओं को ही नहीं, डर को भी जलाना पड़ता है। इसीलिए कबीर शर्त रखते हैं, अपना पूरा घर जलाने की। मन के अंदर बसे इस घर की चीजों को जलाने में कोई कोर-कसर बाकी रह गई तो जो भी चीजें बची हों, वे यात्रा में आगे बढ़ने के इरादे पर पानी फेरने के लिए काफी हो सकती हैं।
अब करियर की चिंता स्थगित करने की शर्त थोड़ी-बहुत तो दिपके और उनकी टोली भी पूरी कर ही चुकी थी। फिर भी, जब जेल के अंदर डालकर बेल की संभावना आगे खिसकाई जाने लगी और यह आशंका घनीभूत हुई कि कहीं आगे की पूरी जिंदगी जेल में ही सड़ाने की व्यवस्था न कर दी गई हो, कहीं उन्हें दूसरा उमर खालिद बनाने का फैसला न कर लिया गया हो, तो पुलिस के सामने अड़े रहने और डटे रहने का निश्चय हवा में घुलकर विलीन होने लगा। धड़धड़ पीस बॉन्ड साइन होने लगे।
अपवाद बनी अविचल सी मूर्ति कोई नजर आई तो वह दुबली-पतली सी काया, जिसने आर्मी अफसर पिता की देखरेख में खुद को जलाने की ट्रेनिंग पाई थी और विचारों के अंगारों में सोने सा निखरना सीखा था। कबीर की कसौटियों को पहले ही आजमा न चुकी होती तो फासीवादी शक्तियों के पैंतरों के आगे टिके रहने का करतब कैसे दिखाती।
(प्रणव प्रियदर्शी ‘जनसत्ता’, ‘लोकमत समाचार’ और ‘नवभारत टाइम्स’ में लंबी पत्रकारीय पारी के बाद फ़िलहाल स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं और यूट्यूब चैनल @dhoop_chhaanv चला रहे हैं।)